Festival

Krishna Janmashtami 2026: 4 सितंबर को जन्माष्टमी, जानें पूजा मुहूर्त और व्रत विधि

Meta Description: Krishna Janmashtami 2026: इस साल जन्माष्टमी 4 सितंबर को मनाई जाएगी। जानिए जन्माष्टमी की तारीख, पूजा का शुभ समय, व्रत विधि, पूजा सामग्री और भगवान कृष्ण के जन्म की कथा।

4 सितंबर 2026 को 9:15 AM बजे
Muzaffarpur, Bihar
Crime Sach Khabar
6 min read
337495.png

Krishna Janmashtami 2026: 4 सितंबर को जन्माष्टमी, जानिए पूजा का शुभ समय, व्रत और श्रीकृष्ण जन्म की कथा

Krishna Janmashtami 2026: भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व जन्माष्टमी इस वर्ष 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सनातन परंपरा में इस त्योहार का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं और कई भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं। रात में भगवान के जन्म के समय विशेष पूजा, अभिषेक और आरती की जाती है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में जन्माष्टमी को लेकर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। मंदिरों में सजावट के साथ भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वहीं, घरों में भी लोग लड्डू गोपाल के लिए झूला सजाते हैं और भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं।

4 सितंबर को क्यों मनाई जाएगी जन्माष्टमी?

हिंदू पंचांग के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। इसी तिथि की स्मृति में हर साल जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है।

2026 में अष्टमी तिथि 4 सितंबर की रात करीब 2:25 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात करीब 12:13 बजे तक रहने की जानकारी पंचांग में दी गई है। इसी वजह से इस वर्ष जन्माष्टमी का मुख्य पर्व 4 सितंबर को मनाया जाएगा।

जन्माष्टमी की पूजा के लिए रात का समय विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण का अवतार मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए श्रद्धालु रात में निशीथ काल के दौरान भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं।

जन्माष्टमी 2026 में पूजा का समय

जन्माष्टमी पर पूजा का समय स्थान के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। बिहार के कई क्षेत्रों में निशीथ काल के दौरान पूजा का समय रात 11 बजे के बाद से शुरू होता है।

बिहार शरीफ के लिए निशीथ पूजा का समय लगभग रात 11:24 बजे से 12:10 बजे तक बताया गया है। वहीं चकिया क्षेत्र में यह समय लगभग 11:26 बजे से 12:12 बजे तक माना गया है।

इस दौरान भक्त भगवान कृष्ण की प्रतिमा या लड्डू गोपाल का अभिषेक करते हैं। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और फूल, तुलसी तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा पूरी होने के बाद आरती की जाती है और भक्त प्रसाद ग्रहण करते हैं।

जन्माष्टमी पर कैसे रखें व्रत?

जन्माष्टमी के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार उपवास रखते हैं। कुछ लोग पूरे दिन अन्न का सेवन नहीं करते, जबकि कई भक्त फलाहार करते हैं।

व्रत में सामान्य तौर पर फल, दूध, दही, मखाना, सिंघाड़े के आटे से बने व्यंजन और अन्य फलाहारी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ श्रद्धालु निर्जला व्रत रखने की परंपरा भी निभाते हैं।

हालांकि हर व्यक्ति की व्रत रखने की क्षमता अलग होती है। इसलिए उपवास स्वास्थ्य और व्यक्तिगत धार्मिक परंपरा को ध्यान में रखकर रखना उचित माना जाता है। व्रत खोलने यानी पारण का समय भी अलग-अलग परंपराओं और पंचांग के अनुसार निर्धारित किया जाता है।

लड्डू गोपाल की पूजा में क्या चढ़ाएं?

जन्माष्टमी की पूजा में भगवान कृष्ण को उनके प्रिय माने जाने वाले कई प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। पूजा स्थल की सफाई के बाद लड्डू गोपाल को स्थापित करके दीपक जलाया जाता है।

इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और अन्य सामग्री से पंचामृत तैयार कर भगवान का अभिषेक करने की परंपरा है। अभिषेक के बाद बाल गोपाल को नए कपड़े पहनाकर उनका श्रृंगार किया जाता है।

भगवान को माखन-मिश्री, तुलसी दल, फल, मिठाई और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म की कथा या भजन-कीर्तन के बाद आरती की जाती है।

श्रीकृष्ण के जन्म की क्या है मान्यता?

धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में श्रीकृष्ण के जन्म की कथा का विशेष स्थान है। मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और वासुदेव के यहां हुआ था। उस समय मथुरा पर कंस का शासन था।

कंस को भविष्यवाणी के कारण भय था कि देवकी की आठवीं संतान उसके अंत का कारण बनेगी। इसी डर से उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया।

मान्यता के अनुसार आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। इसके बाद वासुदेव उन्हें मथुरा से गोकुल ले गए। वहां नंद बाबा और माता यशोदा ने उनका पालन-पोषण किया। भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी जन्माष्टमी के दौरान श्रद्धा से सुनाई जाती हैं।

जन्माष्टमी के बाद दही-हांडी की परंपरा

श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन और दही से जुड़ी कथाएं काफी लोकप्रिय हैं। इसी से प्रेरित होकर कई स्थानों पर जन्माष्टमी के बाद दही-हांडी का आयोजन किया जाता है।

इसमें ऊंचाई पर मटकी बांधी जाती है और युवाओं की टोली मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ने का प्रयास करती है। कई शहरों में दही-हांडी कार्यक्रम के साथ सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन भी होते हैं।

2026 में कई जगहों पर दही-हांडी कार्यक्रम 5 सितंबर को आयोजित किए जाने की संभावना है। स्थानीय आयोजनों का कार्यक्रम संबंधित समितियों और प्रशासन की घोषणा के अनुसार अलग हो सकता है।

मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी का अलग रंग

भगवान कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और उनकी बाल लीलाओं से जुड़े वृंदावन में जन्माष्टमी का उत्सव विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। इस अवसर पर मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है।

श्रद्धालु भगवान के दर्शन और विशेष पूजा में शामिल होने के लिए अलग-अलग स्थानों से पहुंचते हैं। मंदिरों में कृष्ण जन्म की झांकी, भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

देश के दूसरे शहरों में भी जन्माष्टमी पर घरों और मंदिरों में विशेष आयोजन देखने को मिलते हैं। बच्चों को कृष्ण और राधा के रूप में तैयार करने की परंपरा भी कई परिवारों में देखने को मिलती है।

जन्माष्टमी हमें क्या संदेश देती है?

जन्माष्टमी का पर्व केवल भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है। इसे धर्म, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा से भी जोड़ा जाता है।

भगवान कृष्ण के जीवन और भगवद्गीता के संदेश में कर्म को विशेष महत्व दिया गया है। गीता में व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए परिणाम की चिंता से ऊपर उठने की सीख दी गई है।

इसी कारण जन्माष्टमी आज भी करोड़ों लोगों के लिए आस्था के साथ-साथ सकारात्मक जीवन मूल्यों का पर्व है। 4 सितंबर 2026 को देशभर में श्रद्धालु

भक्ति, पूजा और उत्साह के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएंगे।

कमेंट करें

0 / 50 शब्द

कमेंट्स

कमेंट लोड हो रहे हैं...