निजी अस्पतालों की फार्मेसी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दवाओं की कीमत पर उठे सवाल
निजी अस्पतालों में दवाओं की कीमत और अस्पताल की फार्मेसी से खरीद की व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम सवाल उठाए हैं। केंद्र सरकार से जवाब तलब किया गया है, जबकि मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को होगी।
निजी अस्पतालों की फार्मेसी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दवाओं की कीमत और मरीजों से खरीद की अनिवार्यता पर उठे सवाल
नई दिल्ली: देशभर में निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान दवाएं और मेडिकल उपकरण केवल अस्पताल की अपनी फार्मेसी से खरीदने की कथित अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ, दवाओं की कीमतों में भारी अंतर और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत होने वाले भुगतान की पारदर्शिता जैसे अहम मुद्दों पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मामले की अगली सुनवाई अब 12 अक्टूबर 2026 को तय की गई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP), जेनेरिक दवाओं के उपयोग, गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों और निजी अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया कि कई मामलों में मरीजों और उनके परिजनों को बाहर से सस्ती दवाएं खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती।
अस्पताल की फार्मेसी से दवा खरीदने का दबाव
याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि कई निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को दवाएं, सर्जिकल सामान और मेडिकल डिवाइस केवल अस्पताल की इन-हाउस फार्मेसी से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। यदि मरीज के परिजन वही दवा किसी दूसरी मेडिकल दुकान से कम कीमत पर खरीदकर लाते हैं, तो उसे स्वीकार करने में आनाकानी की जाती है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि बाहर से खरीदी गई दवा वही है, तो अस्पताल इलाज की जिम्मेदारी लेने से पीछे क्यों हटता है। अदालत ने कहा कि मरीज और उसका परिवार पहले से ही मुश्किल दौर से गुजर रहा होता है, ऐसे में इस तरह की स्थिति आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकती है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल यह मामला याचिकाओं में लगाए गए आरोपों और व्यापक नियामकीय व्यवस्था की जांच से जुड़ा है, इसलिए इसे सभी निजी अस्पतालों पर समान रूप से लागू नहीं माना जा सकता।
₹2,700 की दवा पर ₹27,000 MRP का मामला
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि 22 सितंबर 2026 की सुनवाई से भी जुड़ी है। उस दिन अदालत के सामने कैंसर की एक दवा का उदाहरण रखा गया, जिसकी रिटेल खरीद कीमत लगभग ₹2,700 बताई गई, जबकि उसी दवा पर ₹27,000 का अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP दर्ज था। दवा की कीमत में लगभग दस गुना अंतर देखकर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए इसे "दिनदहाड़े डकैती" जैसा बताया था। अदालत ने सवाल उठाया कि जब दवा इतनी कम कीमत पर बाजार में उपलब्ध हो सकती है, तो उसके पैकेट पर इतनी अधिक MRP तय करने का आधार क्या है।
पीठ ने यह भी पूछा कि दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर होने के बावजूद संबंधित नियामक व्यवस्था इसे प्रभावी तरीके से नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही है।
सरकारी योजनाओं के भुगतान पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत होने वाले इलाज और दवाओं की प्रतिपूर्ति का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने चिंता जताई कि यदि सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों की दवाओं पर अत्यधिक कीमत दिखाई जाती है और उसी आधार पर सरकारी खजाने से भुगतान लिया जाता है, तो इसका बोझ अंततः देश के करदाताओं पर पड़ता है। अदालत ने कहा कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि सार्वजनिक धन का सही उपयोग हो और मरीजों के नाम पर किसी तरह की अनियमितता की गुंजाइश न रहे।
16 प्रतिशत मार्जिन पर भी हुई चर्चा
29 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं पर एक समान लाभ सीमा तय करने की संभावना पर भी सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के लिए अलग-अलग व्यवस्था रखने के बजाय क्या सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन जैसी व्यवस्था लागू की जा सकती है।
हालांकि अदालत ने इस संबंध में कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। यह केवल सुनवाई के दौरान उठाया गया एक सवाल है, जिस पर केंद्र सरकार से विचार-विमर्श कर जवाब देने को कहा गया है।
केंद्र सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को संबंधित विभागों के साथ विचार-विमर्श करने के लिए अतिरिक्त समय दिया है। अदालत चाहती है कि सरकार दवाओं की कीमत, निजी अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर स्पष्ट रुख पेश करे।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को होगी, जिसमें सरकार से इन सभी मुद्दों पर विस्तृत जवाब देने की अपेक्षा की गई है।
मरीजों के लिए क्यों अहम है यह मामला?
देश में हर साल लाखों लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं। ऐसे में दवाओं की कीमत, अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में पारदर्शिता जैसे मुद्दे सीधे आम जनता से जुड़े हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इन मुद्दों पर गंभीर चिंता जताई है और सरकार से जवाब मांगा है। अंतिम दिशा-निर्देश और संभावित सुधार अगली सुनवाई और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होंगे। तब तक इस मामले पर देशभर की नजरें टिकी रहेंगी।
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