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मुजफ्फरपुर जमीन घोटाला: निलंबित CO और RO गिरफ्तार, विधायक अमित रानू का भी नाम

मुजफ्फरपुर के मुशहरी जमीन फर्जीवाड़ा मामले में निलंबित CO महेंद्र कुमार शुक्ला और राजस्व अधिकारी करुण करण गिरफ्तार। 70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन के कथित फर्जी दाखिल-खारिज मामले में विधायक अमित कुमार रानू समेत आठ लोगों पर प्राथमिकी दर्ज है। दोनों अधिकारियों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

9 अक्टूबर 2026 को 11:02 PM बजे
Muzaffarpur, Bihar
Crime Sach Khabar
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मुशहरी जमीन फर्जीवाड़ा: निलंबित CO महेंद्र कुमार शुक्ला और राजस्व अधिकारी करुण करण गिरफ्तार, विधायक अमित रानू का भी नाम

मुजफ्फरपुर में 70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन के कथित फर्जी दाखिल-खारिज का मामला, बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी; दोनों अधिकारियों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया।

मुजफ्फरपुर: मुशहरी अंचल से जुड़े कथित जमीन फर्जीवाड़े के मामले में पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। निलंबित अंचलाधिकारी (CO) महेंद्र कुमार शुक्ला और राजस्व अधिकारी करुण करण को अहियापुर पुलिस ने गिरफ्तार किया है। यह मामला एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी की 70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन के कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दाखिल-खारिज कराने से जुड़ा है। मामले में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) से जुड़े बेलसंड विधायक अमित कुमार रानू समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

गिरफ्तारी के बाद दोनों अधिकारियों को सदर अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मेडिकल जांच कराई गई। इसके बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया। न्यायालय के आदेश पर दोनों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। मामले में जमीन के दस्तावेजों की प्रामाणिकता, राजस्व रिकॉर्ड में कथित बदलाव और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका जांच के दायरे में है।

70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन को लेकर शुरू हुआ विवाद

यह पूरा मामला अहियापुर थाना क्षेत्र के शहबाजपुर निवासी विजय कुमार की पुश्तैनी जमीन से संबंधित है। विजय कुमार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार में अवर सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उनकी शिकायत के अनुसार, उनके परिवार की 70 डिसमिल जमीन को कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दूसरे लोगों के नाम दर्ज कराने की कोशिश की गई।

शिकायत में बताया गया है कि संबंधित जमीन उनके पिता जितेंद्र प्रसाद शाही और दादा योगेंद्र प्रसाद शाही के नाम दर्ज थी। जमीन का विवरण खाता संख्या 53 और खेसरा संख्या 403 बताया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जमीन के स्वामित्व से जुड़े पुराने दस्तावेजों का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलवाने की प्रक्रिया अपनाई गई।

पुश्तैनी जमीन के स्वामित्व को लेकर उठे इस विवाद में दस्तावेजों की वैधता और जमीन की वास्तविक खरीद-बिक्री की स्थिति महत्वपूर्ण हो गई है। अब जांच के दौरान यह पता लगाना होगा कि संबंधित जमीन के दस्तावेज किस आधार पर प्रस्तुत किए गए और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में किन अभिलेखों का इस्तेमाल हुआ।

1986 के दस्तावेज को लेकर शिकायत में उठाए गए सवाल

शिकायतकर्ता के अनुसार, हाजीपुर के सेलमपुर कुचुनदास कोर्ट निवासी कृष्णनंदन पासवान ने जमीन का खरीदार होने का दावा किया था। इस दावे के समर्थन में निबंधन कार्यालय के दस्तावेज संख्या 10612 का उल्लेख किया गया, जिसकी तारीख 6 जून 1986 बताई गई है।

विजय कुमार की शिकायत के मुताबिक, संबंधित दस्तावेज संख्या की जांच में वह किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज मिली। इसी आधार पर जमीन से जुड़े दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए गए।

हालांकि, किसी दस्तावेज को लेकर शिकायत में लगाए गए आरोप और जांच के बाद स्थापित होने वाले तथ्य अलग-अलग होते हैं। इसलिए पूरे मामले में निबंधन कार्यालय के मूल अभिलेख, दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां और राजस्व विभाग के रिकॉर्ड का मिलान महत्वपूर्ण होगा।

जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित दस्तावेजों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया और जमीन के स्वामित्व को लेकर प्रस्तुत दावों का वास्तविक आधार क्या है।

दाखिल-खारिज और जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव का आरोप

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जमीन का दाखिल-खारिज कराया गया। इसके बाद जमीन को अभिनव कुमार, अरविंद कुमार मेहता और तुषार सिंह के नाम दर्ज कराने तथा दोबारा दाखिल-खारिज कराने की प्रक्रिया अपनाए जाने का भी उल्लेख है।

राजस्व विभाग में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया का इस्तेमाल जमीन के हस्तांतरण के बाद संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में प्रस्तुत दस्तावेजों और उपलब्ध अभिलेखों की जांच महत्वपूर्ण होती है।

इस मामले में मुख्य सवाल यही है कि विवादित जमीन के दाखिल-खारिज के लिए किन दस्तावेजों को आधार बनाया गया। साथ ही, आवेदन की जांच किस स्तर पर हुई और संबंधित रिकॉर्ड में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत दर्ज किए गए।

यदि दस्तावेजों में किसी प्रकार की गड़बड़ी सामने आती है, तो यह भी जांच का विषय होगा कि उसके लिए कौन जिम्मेदार था। फिलहाल मामले में लगाए गए आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही होगी।

विधायक अमित कुमार रानू समेत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी

इस जमीन विवाद में बेलसंड के विधायक अमित कुमार रानू, उनके भाई अभिनव कुमार, तत्कालीन अंचलाधिकारी महेंद्र कुमार शुक्ला, राजस्व अधिकारी करुण करण और अंचल से जुड़े कर्मचारियों समेत कुल आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

शिकायतकर्ता ने जमीन से संबंधित दस्तावेजों और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया में कथित मिलीभगत का आरोप लगाया है। प्राथमिकी में नाम आने के बाद मामले ने प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर भी ध्यान खींचा है।

हालांकि, प्राथमिकी में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज होना अपने आप में अपराध साबित होना नहीं है। आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और न्यायालय की प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।

फिलहाल दो राजस्व अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद मामले की जांच में संबंधित दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अन्य आरोपितों के संबंध में आगे की कार्रवाई क्या होती है, यह जांच की प्रगति पर निर्भर करेगा।

पहले भी विवादित दाखिल-खारिज मामले में कार्रवाई का सामना कर चुके थे CO

निलंबित अंचलाधिकारी महेंद्र कुमार शुक्ला के खिलाफ इससे पहले भी दाखिल-खारिज से जुड़े एक अन्य मामले में आरोप सामने आए थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उस मामले में मृत महिला मालती देवी के नाम से दर्ज आपत्ति को स्वीकार करने और आवेदन को लगभग 140 दिनों तक लंबित रखने का आरोप लगाया गया था।

इस मामले में जिलाधिकारी कुमार गौरव की जांच रिपोर्ट के बाद राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने महेंद्र कुमार शुक्ला को निलंबित कर दिया था। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय सारण प्रमंडल के आयुक्त कार्यालय में निर्धारित किया गया था।

यह अलग मामला था, लेकिन वर्तमान जमीन विवाद में उनकी गिरफ्तारी के बाद राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली और दाखिल-खारिज से जुड़े मामलों की जांच फिर चर्चा में आ गई है।

जमीन से जुड़े मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल आवेदन पर कार्रवाई करने तक सीमित नहीं होती। संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन, पुराने रिकॉर्ड का मिलान और निर्धारित प्रक्रिया का पालन भी महत्वपूर्ण होता है।

ऑनलाइन परिमार्जन प्लस और LPC की भूमिका भी जांच के दायरे में

इस मामले में कथित फर्जी केवाला, दाखिल-खारिज, ऑनलाइन परिमार्जन प्लस और भूमि स्वामित्व प्रमाणपत्र (LPC) से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप भी लगाए गए हैं।

ऑनलाइन परिमार्जन प्लस के माध्यम से भूमि रिकॉर्ड में सुधार या संबंधित प्रविष्टियों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। वहीं, भूमि स्वामित्व प्रमाणपत्र का उपयोग निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रियाओं में जमीन से संबंधित विवरण और स्वामित्व के दावे के लिए किया जाता है।

ऐसे में जांच के दौरान यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विवादित जमीन से संबंधित ऑनलाइन रिकॉर्ड में कब और किस आधार पर बदलाव किए गए। आवेदन किसने दिया, किन दस्तावेजों को संलग्न किया गया और संबंधित अधिकारियों ने किन अभिलेखों के आधार पर निर्णय लिया, इन बिंदुओं की पड़ताल मामले की दिशा तय कर सकती है।

इसके अलावा, मूल निबंधन अभिलेख और अंचल कार्यालय में उपलब्ध दस्तावेजों का मिलान भी महत्वपूर्ण होगा। यदि रिकॉर्ड में किसी प्रकार की विसंगति मिलती है, तो उसकी प्रकृति और जिम्मेदारी निर्धारित करने के लिए साक्ष्यों की जांच आवश्यक होगी।

जांच के निष्कर्ष पर टिकी आगे की कार्रवाई

मुशहरी जमीन फर्जीवाड़ा मामले में दो राजस्व अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद अब जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। पुलिस को शिकायत में लगाए गए आरोपों, संबंधित दस्तावेजों और दाखिल-खारिज की प्रक्रिया के बीच संबंधों की पड़ताल करनी होगी।

वहीं, 70 डिसमिल पुश्तैनी जमीन के वास्तविक स्वामित्व से जुड़े रिकॉर्ड का सत्यापन भी इस मामले का अहम हिस्सा है। प्राथमिकी में नामजद अन्य लोगों की भूमिका और कथित अनियमितताओं में उनकी संलिप्तता का निर्धारण भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

फिलहाल, दोनों अधिकारियों को न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहने की उम्मीद है। जांच में सामने आने वाले तथ्य ही स्पष्ट करेंगे कि जमीन के दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी कैसे हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

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